Nov 28 2022 / 3:40 PM

हाई कोर्ट ने बिना साक्ष्य आरोपी बनाने की पुलिस कार्रवाई को माना गलत, अब दोषी अफसरों के खिलाफ कार्रवाई की तैयारी


इंदौर। फरियादी, पीडि़त और गवाह किसी ने भी नाम नहीं लिया। इसके बावजूद एक पत्रकार को बिना साक्ष्य आरोपी बनाने की पुलिस कार्रवाई को हाई कोर्ट ने गलत माना हैं। इस फैसले के बाद अब पत्रकार दोषी अफसरों के खिलाफ कानूनी कार्रवाई की तैयारी में है।

मामला इस प्रकार है कि एमजी रोड पुलिस ने करीब सात साल पहले 4 अक्टूबर 2015 को विनय वाधवानी और कमल बंसारी की रिपोर्ट पर धारा 384, 385 और 506 का केस दर्ज किया था। दोनों ने तत्कालीन डीआईजी संतोष सिंह को आवेदन दिया था, जिसमें कहा था कि ताहिर अली और अब्बास अली से पैसों की वसूली की गई है, उसे ब्लैकमेल किया जा रहा है।

एएसपी बिट्टू सहगल को जांच सौंपी गई थी। पुलिस ने मामले में मुलजिम पीयूष जैन को हिरासत में लेकर उस पर दबाव बनाया और धारा-27 साक्ष्य अधिनियम के आधार पर पत्रकार सूरज उपाध्याय को भी इस केस में मुलजिम बना दिया। उपाध्याय को बाद में सेशन कोर्ट से अग्रिम जमानत मिल गई।

केस में प्रथम श्रेणी न्यायिक दंडाधिकारी की कोर्ट में चालान पेश किया गया। चालान के खिलाफ धारा 227 सीआरपीसी के तहत डिस्चार्ज का आवेदन लगाया, जो कोर्ट ने खारिज कर दिया। इसकी एडीजे की कोर्ट में रिवीजन की गई, इसे भी खारिज कर दिया। इसके बाद सीनियर एडवोकेट विवेक सिंह ने 2018 में हाई कोर्ट इंदौर में उपाध्याय कीओर से धारा 482 सीआरपीसी के तहत एफआईआर निरस्त करने का आवेदन लगाया।

न्यायमूर्ति सत्येंद्र कुमार सिंह की बेंच में सुनवाई हुई। सभी पक्षो की बहस सुनकर उन्होंने दोनों निचली कोर्ट के आदेश निरस्त कर दिए और आवेदन मंजूर करते हुए उपाध्याय के विरुद्ध निचली कोर्ट में चल रही कार्रवाई (प्रोसिडिंग) भी निरस्त कर दी। हाई कोर्ट ने माना कि उपाध्याय के विरुद्ध कोई साक्ष्य नही है ऐसे में उनके विरुद्ध कोई मामला नहीं बनता है।

पत्रकार उपाध्याय के मुताबिक हाई कोर्ट के इस फैसले के बाद अब वे उनके विरुद्ध झूठी एफआईआर करने वाले पुलिस अफसरों के खिलाफ धारा 219, 166-ए, 120-बी, 499 और 500 आईपीसी के तहत केस परिवाद लगाएंगे। प्रेस काउंसिल ऑफ इंडिया को भी सारे दस्तावेजों के साथ शिकायत की जाएगी।

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