पूर्व लोकसभा अध्यक्ष द्वारा बेटे को निर्दोष बताने पर महाराष्ट्र ब्राह्मण बैंक के पूर्व अध्यक्ष ने उठाये सवाल

इंदौर । शहर की मराठी समाज की प्रतिष्ठित संस्था महाराष्ट्र ब्राह्मण सहकारी बैंक के घोटालों की फाइल फिर से खोले जाने की चर्चाओं के बीच पूर्व लोकसभा अध्यक्ष सुमित्रा महाजन द्वारा इसमें पदाधिकारी रहे अपने बेटे मिलिंद महाजन को निर्दोष बताए जाने पर बैंक के पूर्व अध्यक्ष व शिकायतकर्ता अनिल धड़वईवाले ने कई सवाल उठाए हैं ।

एक बयान में उन्होंने कहा कि ताई यह बताएं कि यदि मिलिंद महाजन निर्दोष है तो फिर बैंक के संचालक मंडल के चुनाव के सालभर बाद ही सहकारिता विभाग ने उन्हें संचालक पद के लिए अपात्र कैसे ठहराया था ?

क्या सहकारिता विभाग के ऑडिट रिपोर्ट के सैकड़ों पृष्ठों पर लिखे आक्षेप झूठे हैं ? धड़वईवाले ने कहा कि अभी तक इस मामले में जो जांच हुई , वे पूरी तरह सतही तौर पर की गई थीं । 1998 में ही मेरी मय सबूत 40 शिकायती आवेदनों पर धारा 60 के तहत जांच की कार्यवाही अधूरी की गई थी, वहीं कई शिकायतें गायब कर दी गई थीं ।


उन्होंने कहा कि मिलिंद वर्ष 1997 से 2002 ( 5 साल ) और वर्ष 2002 से अप्रैल 2003 तक संचालक रहे थे , तब बैंक को सहकारिता से डी – क्लास मिला था । 1997 के चुनाव के साल – भर बाद के सहकारिता विभाग के ऑडिट रिपोर्ट – ( 1998 – 99 व 1999 – 2000 ) के लगभग 100 पृष्ठों पर बैंक में हुई बड़ी गंभीर आर्थिक धांधलियों के बारे में अनेक तथ्यात्मक आक्षेप उल्लेखित हैं।


उन्होंने कहा कि इसी तरह बैंक के लिफ्ट केस मामले में और बैंक घाटे में चलते मनमानीपूर्वक बांटे गये लाखो के अनुदान प्रकरण में मिलिंद को भी दोषी करार दिया जाकर वसूली सम्बंधी मामला सहकारिता न्यायालय में जारी है । उन्होंने कहा कि ताई का यह कहना भी गलत है कि उनके प्रयासों से ही बैंक के हितग्राहियों को एक लाख जमा पूंजी मिली । ये जमा राशि तो डिपॉजिट इंश्योरेंस क्रेडिट कॉर्पोरेशन ( मुंबई ) के नियमानुसार मिलनी ही थी , इसमें ताई का कोई रोल नहीं है ।


उल्लेखनीय है कि उक्त बैंक घोटाले की जांच सरकार द्वारा फिर से कराए जाने के सवाल पर गत दिनों ताई ने प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए कहा था कि सरकार को जो करना है करे , उन्हें विश्वास है कि उनका बेटा इसमें निर्दोष है ।

यह लिखा था आपत्ति में

उन्होंने बताया कि सहकारिता अधिकारी श्रीमती विजया कोराने ने अपनी रिपोर्ट में स्पष्ट लिखा है कि इन सब कमियों के रहते इस नतीजे पर पहुंची हूं कि बैंक अध्यक्ष डबीर ने बैंक को एकल स्वामित्व इकाई मानकर प्रबंधकारिणी के अन्य संचालकों को अंधकार में व गुमराह करते हुए केवल मौखिक चर्चा के आधार पर अपने पद का व अधिकारों का दुरुपयोग करते हुए यश कम्पनी ( यशोवर्धन फाटक ) से व्यावसायिक सम्बंधों से जुड़े मिलिंद महाजन के माध्यम से अप्रत्यक्ष लाभ कमाया जाना पाया गया है । चूंकि मनीष डबीर अध्यक्ष के पुत्र हैं जो यश एसोशिएट में कार्यरत हैं ।


इससे व्यक्तिगत लाभ कमाने की पुष्टि होती है । अतः बैंक को आर्थिक क्षति पहुंचाने के कृत्य को ध्यान में रखते हुए डबीर अध्यक्ष व मिलिंद संचालक अपने पदों के माध्यम से किये गये कृत्यों के दोषी प्रतीत होने से पदाधिकारी संचालक रहने के पात्र नहीं रहते हैं।

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