इंदौर के मल्टी फ्लेक्स लूट के अड्डे..

(तेजकुमार सेन)

पांच की चीज पचास में क्यों बिक रही?
पुलिस प्रशासन के अफसर से लेकर जन प्रतिनिधि तक मौन क्यों…

इंदौर। शहर के तमाम मल्टीफ्लेक्स में दर्शकों को खुलेआम लूटा जा रहा है लेकिन पुलिस व प्रशासन से लेकर जन प्रतिनिधि तक मौन है। अनेक ऐसे मामले में धारा 144 के तहत प्रतिबंधात्मक कार्रवाई की जाती है लेकिन इस मामले
में कुछ नहीं किया जा रहा। नतीजतन आम आदमी पांच रुपए की चीज पचास रुपए तक में खरीदकर खुलेआम लुटने को मजबूर है।

एक समय था जब सिनेमागृहों में टिकटों की अधिकतम सीमा बीस-तीस रुपए हुआ करती थी। समय के साथ दौर बदला और अब शहर के तमाम शपिंगं मॉल्स में मल्टीफ्लेक्टस खुल गए है जहां व्यक्ति दो तीन सो रुपए तक की टिकट लेकर फिल्म देखता है। इन्ही मल्टीफ्लेक्स के अपने ही बनाए गए नियम कायदों के कारण टिकट के अलावा दर्शक अंदर खाने पीने की चीजों में भी लुटने को मजबूर है। बाहर से आप खाने पीने की चीजें तो दूर, पानी की बोतल तक नहीं ले जा सकते। अंदर जो केंटीन संचालित हो रही है, उन पर खाद्य वस्तुओं के दाम सुनकर ही एक आम आदमी तो दांतो तले उंगली दबा लेता है। छोटा सा उदाहरण समोसे का लिया जा सकता है। जो समोसा बाजार में पांच से दस रुपए तक में बिकता है वह इन मल्टी फ्लेक्स में पचास रुपए तक में बेचा जा रहा है। पानी की बोतलें 40 – 50 रुपए में बेची जा रही है। इसी तुलना में अन्य खाद्य पदार्थों के दाम पांच से आठ दस गुना तक है। परिवार के साथ जाने वाले लोग न चाहकर भी अक्सर बच्चों के दवाब में ये महंगी खाद्य वस्तुएं लेने को मजबूर हो रहे है।

इन पर सख्ती क्यों नहीं
सवाल यह उठ रहा है कि जब बाकी सब दुकानदारों पर नियम कानून लागू होते है तो मल्टीफ्लेक्स वालों पर क्यों नहीं? कलेक्टर द्वारा जनहित से जुड़ी इस तरह की तमाम अन्य गड़बडिय़ों को रोकने के लिए धारा 144 के तहत प्रतिबंधात्मक आदेश जारी किए जाते है, लेकिन इनके खिलाफ किसी तरह की कोई सख्ती आज तक कभी देखने को नहीं मिलती। न तो पुलिस या प्रशासनिक अधिकारी इस ओर ध्यान दे रहे है ना ही हमारे शहर के जनप्रतिनिधि जिन्हें हम पार्षद, विधायक या सांसद के रुप में चुनते है, इसे लेकर कभी आवाज उठाते दिखते है। यह भी कभी सुनने में नहीं आया कि किसी विपक्षी दल ने इस मसले को लेकर शहर मे मल्टीफ्लेक्स पर विरोध प्रदर्शन किया हो।

महाराष्ट्र हाई कोर्ट ने दिए थे निर्देश  इसी मामले को लेकर एक जनहित याचिका मुंबई में लगी थी, इसमें महाराष्ट्र हाई कोर्ट द्वारा इस तरह की लूट पर अंकुश के निर्देश भी दिए गए थे। लेकिन इंदौर सहित मप्र में तो इन पर फिलहाल कोई अंकुश लगता नहीं दिख रहा है।

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