मप्र में 60 हजार से ज्यादा बच्चों को नही मिला RTE में एडमिशन

PIL पर हाई कोर्ट ने आदेश सुरक्षित रखा

इंदौर। मध्यप्रदेश में तकरीबन 44 हजार से अधिक बच्चे पात्र होने के बावजूद और लगभग 16000 से अधिक बच्चे छोटे-मोटे कारणों से शिक्षा के अधिकार (RTE) के तहत प्रतिष्ठित स्कूलों में एडमिशन पाने से वंचित रह गए। इस मामले को लेकर दायर जनहित याचिका पर इंदौर हाई कोर्ट की डिवीज़न बेंच ने तर्क सुनकर फैसला सुरक्षित रखा है।

जस्टिस पी के जायसवाल व जस्टिस विवेक रूसिया की डिवीजन बेंच में इन बच्चों को स्कूल में प्रवेश के लिए दूसरी बार लॉटरी करवाने के लिए “इंदौर पालक संघ” के अनुरोध जैन द्वारा सीनियर एडवोकेट विनय झेलावत के माध्यम से दायर इस जनहित याचिका पर सुनवाई हुई।

इसमे प्रदेश में 44,443 बच्चों के द्वारा पात्रता होने के बावजूद ऑनलाइन लॉटरी में मौका नहीं मिलने या छोटी मोटी गलती के कारण 16,148 बच्चों के आवेदन निरस्त करने के मुद्दे पर पात्र बच्चों के लिए दूसरी बार लॉटरी प्रक्रिया आयोजित करने की मांग इस की गयी है।

याचिका में कहा गया कि मध्य प्रदेश में 4 लाख सीटें रिक्त थी जिसमें से 2,94,871 बच्चों ने लॉटरी में ऑनलाइन आरटीई के तहत आवेदन किया था। इसमें से 2,50,428 बच्चों को ही ऑनलाइन लॉटरी में चयनित किया गया। अर्थात् 44,443 बच्चे पात्रता होने के बावजूद रिजेक्ट कर दिए गए हैं।

यही नहीं 16,148 बच्चों को पात्रता होने के बावजूद उनके द्वारा छोटी-मोटी भूल जैसे ‘उम्र के अनुपात में कक्षा का चयन या डोमिसाइल सर्टिफिकेट या उनके द्वारा कागजों में छोटी मोटी गलती के आधार पर भी रिजेक्ट कर दिया गया।

याचिकाकर्ता ने बताया कि पालक संघ द्वारा 20 जुलाई को मध्यप्रदेश के शिक्षा मंत्री विजय शाह से मुलाकात कर स्थिति के बारे में अवगत कराया गया था और मंत्री द्वारा जॉइंट डायरेक्टर को इसमें प्रतिवेदन देने के लिए मौखिक रूप से आदेश भी दिया गया था।

पालक संघ के सदस्य 25 जुलाई को बाल आयोग के अध्यक्ष राघवेंद्र शर्मा से मिले और उन्हें भी स्थिति से अवगत कराया था। इसके बाद पालक संघ निरंतर रूप से शिक्षा सचिव को ईमेल के माध्यम से फॉलो करता रहा लेकिन 15 अगस्त निकलने के बाद भी बच्चों का निराकरण नहीं किया गया। इसलिए अब मजबूर होकर कोर्ट की शरण लेने पड़ी।

पालक संघ की ओर से यह भी कहा गया कि दूसरे राज्य जैसे छत्तीसगढ़, दिल्ली में लॉटरी की प्रक्रिया अनेकों बार की जाती हैं ताकि अधिक से अधिक बच्चों को रिक्त स्थान का लाभ मिले तो मध्यप्रदेश में ऐसा क्यों नहीं किया जा रहा। तर्कों को सुन कोर्ट ने फैसला सुरक्षित रख लिया।

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इंदौर