पढ़िए विधायक मेंदोला ने काकी जी के लिए क्या लिखा.

समाज को एक कुरीति से मुक्ति दिला गई काकीजी
भाजपा के महासचिव श्री कैलाश विजयवर्गीय का अपनी माताजी अयोध्या देवी (काकीजी) से बेहद लगाव था। उनके पैर छूए बिना वे कभी घर से नहीं निकलते थे। घर लौटने पर भी वे सबसे पहले काकीजी के पैर छूकर उनसे मन की बात करते थे। उन्होंने पूरे परिवार को भक्ति, श्रद्धा और आस्था की त्रिवेणी में भिगोया था।

महाप्रयाण के बाद काकीजी को अन्तिम विदाई देने की तैयारी चल रही थी। अंतिम संस्कार का सामान बुलवाया जा रहा था तभी किसी ने कहा कि श्रृंगार का पूरा सामान मत बुलवाना क्योंकि रीत ये है कि मृत्यु के बाद सिर्फ सधवा महिलाओं का सोलह श्रृंगार किया जाता है।आस्था के संस्कारों से सिंचित कैलाश जी का पूरा परिवार धार्मिक रीति -रिवाजों को बहुत मानता है लेकिन ये सुनकर अचानक बड़ी दीदी चन्द्रकान्ता दीदी ने कहा कि काकीजी उस दिव्य ज्योति में विलीन हो रही है जिसमें काकाजी समाए है, इसलिए काकीजी की अंतिम विदाई भी सधवा की तरह सोलह श्रृंगार करके होना चाहिए। कैलाश जी और उनके परिवार ने उसी समय ये फैसला लिया कि काकीजी का bh सोलह श्रृंगार कर उन्हें दिव्य ज्योति में विलीन किया जाएगा। इस तरह जाते जाते भी काकीजी, कैलाश जी और उनके परिवार को कल्याणी महिलाओं के अंतिम संस्कार में स्त्रीत्व के सम्मान की एक नई परंपरा शुरू करने की प्रेरणा दे गई।

इस प्रसंग के लेखक
लोकप्रिय विधायक रमेश मेंदोला है।

Spread the love

7

इंदौर