Mar 20 2019 /
4:37 AM

नेताओं के अंतरविरोध से दरक सकता है भाजपा का गढ़, मालवा-निमाड़ की आठ सीटों पर उलझे है नेताओं के पेंच

कांग्रेस को भी है जीतने वाले चेहरे की दरकार

इंदौर। लोकसभा चुनाव की तारीखों का ऐलान होने के साथ ही बसंत के मौसम में सियासी रंग भी छाने लगा है। पिछले चुनाव में प्रदेश की 29 लोकसभा सीटों में से 27 सीटों पर भाजपा का परचम फहराया था, मगर साल के अंत में सत्ता परिवर्तन के साथ स्थितियां भी बदली-बदली सी हैं।

सत्ता में वापसी करने के साथ कांग्रेस पुरजोर ताकत के साथ मैदान में है, वहीं भाजपा में अंतरविरोध तेजी से मुखर हो रहे हैं। नेताओं के ये ही अंतरविरोध भाजपा की परेशानी का सबब बने हुए हैं। खासकर मालवा-निमाड़ जैसे गढ़ के दरकने का खतरा भाजपा के सामने खड़ा है।

गौरतलब है कि कांग्रेस की सत्ता का मार्ग मालवा-निमाड़ के जरिए ही तय हो पाया था। ऐसे में भाजपा के सामने सूबे की आठों सीटें प्रतिष्ठा का प्रश्न बन चुकी हैं। उधर, कांग्रेस भी मालवा-निमाड़ में नई रणनीति पर विचार कर रही है ताकि ज्यादा नहीं तो 2009 के चुनाव जैसा प्रदर्शन तो कर ही सके, जिसमें आठ में से छह सीटों पर उसका कब्जा था।

आपसी मतभेद बन सकते हैं भाजपा के लिए मुसीबत

इस बार भाजपा के सामने कांग्रेस से भी बड़ी चुनौती अपने ही नेताओं के बीच चल रहे मतभेद बने हुए हैं। खास बात यह है कि इन मतभेदों को दूर करने के लिए पार्टी असहाय नजर आ रही है। बात इंदौर जैसी सीट की करें तो इस बार आठ बार की अजेय योद्धा सुमित्रा महाजन को सीधे विरोध का सामना करना पड़ रहा है। वैसे तो उनके टिकट का विरोध 2009 से मुखर हो चुका था। इस बार उन्हें पार्टी के ही वरिष्ठ नेताओं से सीधी चुनौती मिल रही है। संघ के कोटे से सीधे सियासत के मैदान में आने और उज्जैन लोकसभा सीट पर जीत का परचम फहराने वाले प्रो. चिंतामण मालवीय के टिकट का विरोध स्थानीय स्तर पर शुरू हो गया है।

पार्टी के वरिष्ठ नेताओं के साथ कांग्रेस छोड़कर भाजपा का दामन थामने वाले प्रेमचंद गुड्डू भी टिकट की राह में रोड़ा अटकाने में जुट गए हैं। कुछ ऐसा ही विरोध खंडवा में नंदकुमार सिंह चौहान का हो रहा है। एक दशक से स्थानीय राजनीति में चल रहे शह और मात के खेल में नंदू भैया को घर बैठाने के लिए पार्टी का एक धड़ा कमर कसकर मैदान में हैं। उधर, धार में सावित्री ठाकुर, खरगोन में सुभाष पटेल, मंदसौर में सुधीर गुप्ता भी स्थानीय नेताओं के निशाने पर हैं। रतलाम-झाबुआ सीट पर पार्टी के सामने सर्वसम्मत उम्मीदवार चुनने की चुनौती खड़ी है।

उत्साह में कांग्रेस पर जीतने वाले चेहरे के टोटे

2014 के लोकसभा चुनाव में भाजपा ने मालवा-निमाड़ में क्लीन स्वीप करते हुए आठों सीट पर अपना कब्जा जमा लिया था। इसके साथ ही प्रदेश में कुल 27 सीटों पर भाजपा का कब्जा हो गया।

भाजपा के दिलीपसिंह भूरिया के निधन से खाली हुई रतलाम-झाबुआ सीट पर हुए उपचुनाव में कांग्रेस के कांतिलाल भूरिया ने भाजपा से यह सीट छीन ली। उपचुनाव में मिली जीत से कांग्रेस में अतिरिक्त ऊर्जा का संचार हुआ, साथ ही यह भी जाहिर हो गया कि मोदी फोबिया का असर सूबे में कम हो गया है।

पिछले दिनों मुख्यमंत्री कमलनाथ के नेतृत्व में हुई बैठक में हर सीट से चार नामों की पैनल बनाने की बात हुई है, पर अधिकांश सीटों पर चर्चा उन्हीं पुराने नामों की है जो जनता द्वारा नकारे जा चुके हैं।

दूसरी परेशानी यह है कि पार्टी जीतने वाले विधायकों पर दांव लगाने की जुर्रत नहीं कर सकती, क्योंकि अगर उप चुनाव में गड़बड़ हुई तो सत्ता हाथ से खिसकने का खतरा पैदा हो जाएगा। इस सूरते हाल में अब नए या बाहरी उम्मीदवारों पर पार्टी अपना दांव लगा सकती है।

इन हालात में पार्टी नए और युवा चेहरे को मौका देने पर विचार कर रही है, वहीं कुछ सीटों पर बड़े नेता, सेलिब्रिटी को आगे करने पर विचार चल रहा है। बहरहाल कांग्रेस के सामने बड़ी चुनौती जीतने वाले प्रत्याशी के चयन की है और इस काम में मुख्यमंत्री कमलनाथ, ज्योतिरादित्य सिंधिया और दिग्विजयसिंह के बीच एक राय होना जरूरी है।

वरिष्ठ पत्रकार प्रदीप जोशी से साभार

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