Jan 24 2019 /
12:32 PM

अहंकार के खिलाफ जनादेश, जनता ने भाजपा को सत्ता से बाहर किया, पर कांग्रेस को भी किनारे पर रोका

इंदौर, प्रदीप जोशी। चुनाव परिणाम को लेकर चल रही तमाम अटकलों को ईवीएम खुलने के बाद विराम मिल गया। जो जनादेश आया उसने जनता के मिजाज और मन में पनपे आक्रोश को सामने ला दिया। यह आक्रोश सत्ता के अहंकार के खिलाफ था। इसका उदाहरण है कि भाजपा के सात कद्दावर मंत्रियों को जनता ने घर बैठा दिया।

इसका मतलब यह भी नहीं कि कांग्रेस को स्पष्ट बहुमत मिल गया, उसके भी दर्जन भर बड़े नेताओं को नकार दिया गया। यह चुनाव कई मायनों में याद रखा जाएगा, क्योंकि चुनाव की शुरूआत तो स्थानीय मुद्दों के साथ हुई। बाद में चुनाव राष्ट्रीय मुद्दों पर केंद्रित हो गया। इस बीच मंदिर, हिन्दुत्व, गो रक्षा, आरक्षण जैसे परंपरागत मुद्दों के आधार पर वोटों के ध्रुवीकरण की भी भरपूर कोशिशें हुर्इं।

बहरहाल, राज्य में कांग्रेस की सरकार बनना तय है और भाजपा सशक्त विपक्ष की भूमिका में रहेगी। खास भूमिका बसपा, सपा और गोंडवाना गणतंत्र पार्टी की भी इस चुनाव में रही है। बसपा 2 और सपा को 1 सीट पर जीत मिली है, पर गोंडवाना का खाता नहीं खुल पाया। पर इन तीनों पार्टियों का वोट बैंक बरकरार रहा है।

निरंकुश सत्ता को मिला सबक

किसानों की नाराजी, सामान्य समाज का आक्रोश, नोटबंदी, जीएसटी जैसे फैसलों ने जनता को ना केवल परेशान किया, बल्कि सत्ता के खिलाफ उसके मन में खासा आक्रोश भड़क गया। यह आक्रोश सड़क पर भी नजर आया जब सपाक्स जैसे संगठन के साथ अलग-अलग समाज सरकार के खिलाफ एकजुट हुए थे।

हालांकि चुनावी दौर में यह सब कुछ नजर नहीं आया, पर वोट के रूप में यह आक्रोश खुलकर सामने आ गया। ह्यअब की बार दो सौ पारह्ण का नारा देने वाली भाजपा सत्ता से ही रुखसत हो गई।

भाजपा के इन दिग्गजों को जनता ने नकार दिया

भाजपा के कई दिग्गज इस चुनाव में जनता द्वारा नकार दिए गए। इनमें शिवराज के खास और प्रदेश के गृह मंत्री भूपेंद्र सिंह, अर्चना चिटनीस, जयभानसिंह पवैया, रुस्तमसिंह, शरद जैन, उमाशंकर गुप्ता प्रमुख हैं। इनके अलावा सांसद अनूप मिश्रा, कांग्रेस छोड़कर भाजपा का दामन थामने वाले प्रेमचंद गुड्डू के पुत्र अजीत बौरासी को भी हार का मूंह देखना पड़ा।

कांग्रेस के बड़े नेताओं को भी घर बैठाया

सत्ता प्राप्ति के प्रबल योग लेकर चुनाव मैदान में उतरी कांग्रेस के भी बड़े नेताओं को जनता ने घर बैठाने में कोताही नहीं बरती। चुनाव अभियान में अहम रोल निभाने वाले वरिष्ठ नेता सुरेश पचौरी लंबे अंतर से भोजपुर सीट से हार गए।

उनके अलावा नेता प्रतिपक्ष अजयसिंह, पूर्व मंत्री नरेंद्र नाहटा, सुभाष सोजतिया, शिवराज को उनके गढ़ में चुनौती देने पहुंचे अरुण यादव, प्रदेश कांग्रेस के कार्यकारी अध्यक्ष रामनिवास रावत चुनाव हार गए। कांतिलाल भूरिया अपने पुत्र को चुनाव जिताने में नाकाम साबित हुए। राजनीति और उम्र के उत्तरार्द्ध में पार्टी से नाराज होकर कांग्रेस का दामन थामने वाले सरताज सिंह को भी जनता ने नकार दिया।

*निराश हुए साले साहब*
विधायकी की लालसा में अपने जीजा शिवराजसिंह चौहान की मुखालफत करने वाले संजयसिंह मसानी को भी इस चुनाव में निराशा हाथ लगी। गौरतलब है कि चुनाव प्रचार के बीच संजयसिंह ने घर में बगावत का बिगुल बजाते हुए कांग्रेस का हाथ थाम लिया था। वारासिवनी से कांग्रेस के टिकट पर चुनाव लड़े संजय को हार का सामना करना पड़ा।

*बसपा-सपा का वोट बैंक सुरक्षित*
मध्यप्रदेश में कभी भी त्रिशंकु सरकार के हालात नहीं बने और न ही थर्ड फ्रंट जैसी हलचल हुई है। बावजूद इसके बीते दो दशक में बसपा, सपा और गोंडवाना गणतंत्र पार्टी ने अपना एक फिक्स वोट बैंक जरूर खड़ा कर लिया है। इस चुनाव में तीनों दलों को 2008 की तरह मेंडेट प्राप्त हुआ। बसपा दो सीट और सपा एक सीट जीतने में सफल रही। गोंडवाना पार्टी को कोई सीट तो नहीं मिली, पर वह अपना वोट बैंक बचाने में सफल रही।

प्रदेश में वोट शेयरिंग


पार्टी सीट प्रतिशत
भाजपा 109 41.0
कांग्रेस 114 40.9
बसपा 002 5.0
सपा 001 1.3
गोंगपा 000 1.8 अन्य 004 —-

-वरिष्ठ पत्रकार प्रदीप जोशी की फेसबुक वॉल से साभार

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