समलैंगिक सम्बन्धों पर सुप्रीम कोर्ट में फैसला सुरक्षित

दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को कहा कि अगर कोई कानून मौलिक अधिकारों का उल्लंघन करता है तो उसे खत्म करना अदालत की जिम्मेदारी है। इस पर अदालत सरकार के फैसले का इंतजार नहीं कर सकती।

शीर्ष अदालत ने आज सहमति से समलैंगिक संबंधों को अपराध की श्रेणी से बाहर करने की मांग को लेकर दायर याचिका पर उक्त टिप्पणी के साथ अपना फैसला सुरक्षित रख लिया है और सभी पक्षों को अपने दावे के समर्थन में 20 जुलाई तक लिखित दलीलें दाखिल करने के निर्देश दिए हैं।

चीफ जस्टिस दीपक मिश्रा, जस्टिस आरएफ नरीमन, जस्टिस एएम खानविल्कर, जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़ और जस्टिस इंदू मल्होत्रा की संविधान पीठ ने भारतीय दंड संहिता की धारा-377 की वैधता को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर सुनवाई करते हुए साफ किया कि वे कानून को शायद पूरी तरह खत्म नहीं करेंगे बल्कि दो वयस्कों के बीच सहमति से संबंधों से जुड़े मसले पर ही निर्णय सुनाएंगे।

पीठ ने कहा, “अगर धारा-377 को पूरी तरह खत्म कर दिया गया तो अराजकता फैल जाएगी। हम पूरी तरह पुरुष-पुरुष और पुरुष-महिला के बीच सहमति से संबंधों पर निर्णय लेंगे। इसमें सहमति ही केंद्र बिंदु है।

आप किसी पर बिना उसकी सहमति के अपना यौन रुझान नहीं थोप सकते।”

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इंदौर