कोरोना से जंग जीतकर लौटे इंदौर के युवा अधिवक्ता अमित दुबे की जुबानी, सरकारी अस्पताल में डॉक्टर्स व पैरामेडिकल स्टाफ द्वारा की जा रही अनुकरणीय सेवा की कहानी..

डॉक्टर्स और पैरामेडिकल स्टॉफ बने मूल मानवीय मूल्यों के झंडाबरदार…..

शुक्रिया, आभार और सलाम मनोरमा राजे टी० बी० अस्पताल…..

बुरहानपुर के सरकारी अस्पताल में अपने जन्म के साढ़े चार दशक बाद, पहली बार किसी सरकारी अस्पताल में किसी प्रकार के इलाज के लिए भर्ती होना पड़ा। तमाम सावधानियों के बावजूद, हाहाकारी कोरोना वायरस ने मुझे अपनी गिरफ्त में ले लिया था । वायरस का वार गंभीर था और फेफड़ों की कार्यक्षमताओं की सांसें उखड़ती-सी जा रही थी। सी० टी० स्कैन की रिपोर्ट साफ़ बता रही थी कि इमरजेंसी गहन चिकित्सा की तत्काल ज़रुरत है ताकि अनर्थ को टाला जा सके ।

तारीख – सितम्बर 17 , 2020 । परिवारजनों, मित्रों और शुभचिंतकों ने इंदौर शहर के अस्पतालों में खाली आई० सी ० यू ० बेड की तलाश तन-मन-धन से शुरू की। निजी अस्पतालों और सरकारी अस्पतालों दोनों में बेड उपलब्धता के संकेत ढूंढना घांस के ढेर में सुई ढूंढने जैसा था। कई बड़े निजी अस्पतालों में तो वेटिंग लिस्ट जैसी स्थिति थी ।

सबका घबराना लाज़िमी था। इसी उहापोह में सूचना मिली कि सरकार द्वारा कोरोना वायरस के लिए पूर्णतयः डेडिकेटेड चिकित्सा केंद्र मनोरमा राजे टी ० बी ० अस्पताल, इंदौर पर एक आई ० सी० यू ० बेड उपलब्ध है। सरकारी तंत्र के प्रति बरसों से पोषित जाने-अनजाने भय एवं सच्चे-झूठे किस्से-कहानियां अचानक मानस पटल पर उभर आये । खैर अपनी उखड़ती सांसों को थामे मैंने मनोरमा राजे टी० बी० अस्पताल में प्रवेश किया। इसके साथ ही आनेवाले कुछ दिनों के लिए मेरा मेरे अपनों से प्रत्यक्ष संपर्क स्थगित हो गया।

मेरी स्थिति की गंभीरता के बारे में अस्पताल के स्टाफ को पहले ही जानकारी मिल चुकी थी। तत्काल वहां मौजूद स्टॉफ ने रेस्पिरेटरी इंटेंसिव केयर यूनिट (RICU) के एकमात्र खाली बिस्तर पर लेटा कर शारीरिक गतिविधियों को मॉनिटर करने वाली अलग-अलग मशीनों से मेरे शरीर को जोड़ दिया।

डॉक्टर्स और पैरामेडिक स्टॉफ ने संयम रखने, भरोसा और हिम्मत बनाये रखने की बात कुछ इस तरह कही जैसे मैं उनके खुद के परिवार का हूँ। जिस तरह का खौफ कोरोना वायरस ने दुनिया भर में पैदा कर रखा है तथा जिस तरह मरीज और कोरोना से मृत्यु अब आंकड़े मात्र बन गए हैं, ऐसे में किसी दवा के शरीर में जाने के पहले ही डॉक्टर्स और स्टॉफ के व्यवहार ने खुद को सँभालने में रामबाण-सा असर किया।

अब आनेवाले आठ दिन जो मैंने मनोरमा राजे टी० बी० अस्पताल बिताने थे वह जीवन के उन पहलुओं से साक्षात्कार के ईश्वर प्रदत्त अवसर थे जिन्होंने संकट में साहस, प्रतिबद्धता, समर्पण, सहयोग और सम्बल के नए और सकारात्मक कोण तथा आयामों से रूबरू कराया। निजी अस्पतालों के आकर्षण जिसमें उच्चःस्तरीय प्रोफेशनल चिकित्सीय सेवाओं को निजी अस्पतालों का पर्याय मान लिया गया और सरकारी अस्पतालों को निम्न स्तर सेवाओं की कसौटी मान लिया गया, कम-अज-कम मेरे लिए तो ये परिभाषाएं बदलने जा रही थी।

अभिभूत रह गया मैं ये देख कर कि किस तरह डॉक्टर्स और उनके सहयोगी गंभीर मरीजों को स्वयं शांत संयत हो हाथ से या नलियों से भोजन करा रहे थे। उनका मानना था कि बिना भोजन दवाएं और इलाज उतना असर नहीं करेगा।

हम प्रत्यक्ष में कठोर हो सकते हैं लेकिन डॉक्टर्स और स्टॉफ के सेवा भाव जिसका एकमात्र लक्ष्य मरीज को पहले बचाना और फिर ठीक कर उसे विदा करना था ने एहसास कराया कि मानव अन्तःमन तो निर्मल भाव से ओतप्रोत है बस आज की अंधी दौड़ में जाने-अनजाने हम इस झरने को स्वतंत्र हो पुण्य सलीला बनाने से रोक देते हैं ।

करीब तीन दिन बीतने पर मेरे बिस्तर के पास एक बुजुर्ग को शिफ्ट किया गया। वो लगभग बेसुध से थे। शाम को मरीजों का खाना आया तो मैंने उनका भोजन भी रखवा लिया । सोचा जब वो जागेंगे तो शायद भूख लगे। जब डॉक्टर साब आये तो उन्होंने बताया कि बुजुर्ग रामलालजी करीब 90 साल के हैं और उनके घर से फिलहाल कोई खबर लेने नहीं आया।

मालूम पड़ने पर कि बिस्तर पर कराह रहे वो बुजुर्ग शायद भूखें हैं और खुद खाना खाने में सक्षम नहीं हैं तो डॉक्टर साब ने सबसे पहले उन्हें उठा कर सहारा दे बैठाया और फिर उन्हें तन्मयता से भोजन कराने लगे। करीब 10 से 15 मिनिट का ये प्रसंग किसे द्रवित न करेगा। डॉक्टर साब का अंदाजा सही था । कोरोना बीमारी और भूख दोनों की समान मार पड़ी थी बुजुर्ग पर। पेट में अन्न जाते ही दादा में चेतना का प्रवाह शुरू हुआ। डॉक्टर साब का मानना था कि यहां डॉक्टर्स, स्टॉफ और मरीज एक-दूसरे का हाथ थाम संकट से पार पा लेंगे। मेरे लिए ख़ुशी की बात ये रही कि बुजुर्ग मरीज कि स्थिति में सुधार जारी था, जब मैं डिस्चार्ज हुआ ।

पूरे अस्पताल में इंदौर के अलावा झाबुआ, पीथमपुर, बड़वानी, खरगोन आदि के गंभीर मरीज भी इमरजेंसी में शिफ्ट किये गए थे। कोरोना वायरस बीमारी से लड़ने में दवाओं के अलावा मरीज की नियमित खुराक एक बड़ी महत्वपूर्ण आवश्यकता है। निजी अस्पतालों में डाइट चार्जेज के नाम पर खुराक हेतु शुल्क अलग से देना पड़ता है। लेकिन यहां स्थिति अलग थी। अलग होने के साथ-साथ अनुकरणीय भी। और इसका आपकी की जेब से कोई वास्ता नहीं था।

हर मरीज को सुबह-सवेरे चाय, दूध, बिस्कुट, पोहा या उपमा नाश्ते में उपलब्ध होता। जिसे दूध, जिसकी गुणवत्ता सराहनीय रही, और चाहिए होता उसे बिना ना-नुकुर दिया जाता। सात्विक तरीके से नाममात्र मसालों से बना दोपहर का भोजन जिसमें रोटी, चावल, मूंग दाल, सब्जी और एक फल, जो की अमूमन केला होता है, दिया जाता। शाम को चाय बिस्कुट और रात के भोजन हेतु फिर बैलेंस्ड डाइट। और हाँ, यहां आपको दाल में दाल या सब्जी में सब्जी ढूंढने की तनिक कोशिश नहीं करनी पड़ती।

कोरोना वायरस से जूझ रहे अस्पतालों, डॉक्टर्स, पैरामेडिक स्टॉफ और मरीजों के लिए असल संघर्ष बहुत गंभीर है। पिछले छह माह से हाई अलर्ट मुद्रा में जूझते हुए खीज और निराशा जैसे भावों को झटक कर ज़िन्दगी की लौ प्रज्वल्लित रखने का हौंसला जो डॉक्टर्स और पैरामेडिक स्टॉफ में मैंने देखा उसने आभास कराया कि ऐसे समर्पित मानवसेवियों से ही धरा धुरी पर टिकी हुई हैं वर्ना संकीर्णता और स्वार्थ सिद्धि के एकमेव लक्ष्य का संधान कर खुद को गर्त में पहुंचाने वालों ने कोई कसर थोड़ी ना छोड़ी है।

कुछ इस तरह से चिकित्सीय संसाधनों का प्रबंधन मनोरमा राजे टी० बी० अस्पताल में किया गया हैं कि मरीज और उसकी स्थिति पर चौबीसों घण्टे नज़र रखी जा सके ताकि आवश्यकता पड़ने पर तत्काल और प्रभावी चिकित्सीय दखल हो सके । ये व्यवस्था RICU के अलावा आइसोलेशन वार्डस में भी हैं जहाँ पर RICU के इतर ऑक्सीजन ज़रुरत होने पर मरीज को मुहैया कराई जा सके ।

बहुत कठिन होता है वह समय जब कोई मरीज की तबियत अचानक बिगड़ने लगे। इसका संकेत प्रायः साँसों का अनियमित हो जाना होता है।

जब साँसों के पलड़ों में जीवन झूलता है तो डॉक्टर्स और नर्सिंग स्टॉफ उतनी ही शिद्दत से पलड़े को मझधार से निकाल मरीज को सुरक्षित करने में भिड़ जाते। वो मरीज को किसी भी हाल में खोना नहीं चाहते। ये भाव आप महसूस करते हैं। हर वो जतन, हर वो ज्ञान और हर वो प्रार्थना/इबादत झोंक देते हैं ताकि जीवन कायम रहे और संकट टल जाए। सफल होने पर ज्यादा खुश भी नहीं हो सकते क्योंकि जानते हैं अभी ऐसे कई मोर्चे हैं जहाँ जी-जान लगानी है। किन्तु, जैसा मैंने देखा और महसूस किया, सारे प्रयासों के बाद मरीज को ना बचा पाने कर दर्द आँखों और चेहरों में झलक ही जाता है।

पर थकना मना है, झुकना मना है। ये जज़्बा और इसे इन विपरीत परिस्थितियों में बनाये रखना कोई दैवीय संकल्प प्राप्त करने से कम नहीं है ।

ड़ॉ० सलील भार्गव, डॉ० मिलिंद बाल्दी, डॉ० संजय अवसिया, डॉ ० विजय अग्रवाल, डॉ० दीपक बंसल और उनकी टीम की ग्राउंड जीरो पर मौजूदगी इलाजरत लोगों में ये भाव पुख्ता करती है कि असली डॉक्टर्स उन्हें देख रहे हैं और उनके इलाज को मॉनिटर कर रहे हैं। इस पूरे समय में जिन डॉक्टर साब ने मुझे बहुत प्रभावित किया वो हैं डॉ० सादिक।

ये डॉक्टर साब केरल से हैं । नौजवान है। हार मानने को कतई तैयार नहीं हैं। और हाँ घडी बांधते तो हैं पर ज्यादा ध्यान नहीं देते क्योंकि मरीज की तीमारदारी में वक़्त का हिसाब कहाँ और कौन रखे। उनको जीतते देख बहुत सुकून पाया और उनकी अंतिम सांस तक लड़ अनहोनी को टालने की कोशिशों ने मन ही मन रुलाया भी जब अनहोनी टल ना सकी।

जिस दबाव से कोरोना के इलाज में लगे डॉक्टर्स और स्टॉफ गुजर रहे हैं उसे हम इस बात से समझ सकते हैं कि कई डॉक्टर्स अपने पूरे जीवन में जितने आई० सी० यू० मरीज और मौतें नहीं देखते उतनी तो ये देख चुके हैं। और ये सब एक बहुत छोटे अंतराल में घटा है और अभी भी घट रहा है। आगे कब जा कर ये कोरोना चक्र थमेगा, कोई नहीं जानता । सब कुछ अज्ञात। किन्तु इन डॉक्टर्स और स्टॉफ को एक बात ज्ञात है जिसकी इन्होने गाँठ बाँध ली है कि ‘हम हैं और ज़िन्दगी की साहिल को ओझल नहीं होने देंगे’।

इतनी जटिल व्यवस्था को सुचारू रूप से चलाये रखने में बड़ा अहम् किरदार सफाई व्यवस्था से जुड़े कर्मियों का भी है। दिन में नियमित रूप से वार्डस और गलियारों को केमिकल आदि से धोना और साफ़ करना कोरोना वायरस से मुकाबले के लिए किसी दवा और दुआ जितना ही महत्वपूर्ण है। फिर जब ये काम बिना तनाव लिए प्रफुल्लित हो किया जावे तो माहौल की बोझिलता का टिकना नामुमकिन है ।

मेरे कई परिचित जिन्हे मालूम पड़ा कि मैं मनोरमा राजे याने कि सरकारी अस्पताल में भर्ती हूँ तो वो विचलित भी हुए । पर कुछ थे जिन्होंने कहाँ कि गुरु सही जगह पहुंचे हो असली इलाज तो वहीं हो रहा है, प्राइवेट में नहीं । आठ दिन की सघन देखभाल के बाद मैं डिस्चार्ज हुआ।

जानता नहीं कि निजी अस्पतालों के कोरोना इलाज के मामले में क्या हाल हैं । उम्मीद करता हूँ कि मनोरमा राजे टी० बी० अस्पताल जैसे ‘दिल का हाल सुने दिलवाला, सीधी-सी बात ना मिर्च-मसाला’ डॉक्टर्स और स्टॉफ और व्यवस्था हर उस को हांसिल हो जिस पर इस बीमारी की मार पड़ी हो ।
शुक्रिया, आभार ।

एडवोकेट अमित दुबे की फेसबुक वॉल से साभार

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इंदौर