चेक बाउंस को अपराध के श्रेणी से बाहर करने को कोई आधार ही नहीं बनता….. कहाँ हैं निगाहें, कहाँ है निशाना,….

भारत सरकार के वित्त मंत्रालय के वित्तीय सेवा विभाग द्वारा जून 8, 2020 को चेक बाउंस को आपराधिक कृत्य की श्रेणी से हटाने के प्रस्ताव पर जनता के विचार आमंत्रित किये गए हैं।

भारत सरकार द्वारा ऐसा करने के जिन कारणों का वर्णन इस विज्ञप्ति में किया गया है उनसे ही स्पष्ट है कि इनमे से कोई भी कारण चेक बाउंस को अपराध की श्रेणी से बाहर करने की सरकार की मंशा को पुख्ता नहीं करता। इसके उलट अगर इन कारणों को गौर से देखा जाए तो वे चेक बाउंस को अपराध रखे जाने की पैरवी करते हैं।

परक्राम्य लिखत अधिनियम की धारा 138 चेक बाउंस को अपराध करार देती है तथा चेक जारी करने वाले को दो वर्ष तक के कारावास या चेक राशि के दुगुनी राशि के जुर्माने से या दोनों से दण्डित करने की व्यवस्था प्रदान करती है।

भारत सरकार के जून 8, 2020 के प्रकाशन के अनुसार कुछ छोटे अपराधों को अपराध की श्रेणी से बाहर करना सरकार की प्राथमिकता है। सरकार का मानना है कि ऐसी गलतियां जो गलती से हो जाती हो तथा जिनके पीछे कोई आपराधिक मनःस्थिति न हो उन्हें अपराध की श्रेणी से बाहर करना ज़रूरी है क्योंकि ये आपराधिक प्रावधान निवेश आकर्षित करने में बड़ा रोड़ा साबित हो रहे हैं। सरकार का ये भी मानना है कि इस स्थिति के फलस्वरूप व्यापार की भावना (बिज़नेस सेंटीमेंट) और घरेलू तथा विदेशी निवेश पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ रहा है।

सरकार का आगे ये भी मत है कि व्यावहारिक त्रुटियों और कानून और प्रक्रिया के छोटे-मोटे गैर अनुपालन को आपराधिक कृत्य मानने से व्यापार पर बोझ बढ़ता है, इसलिए भारत सरकार का ये मानना है कि ऐसे आपराधिक कृत्यों का शमनीय (compoundable) के रूप में पुनर्वर्गीकरण आवश्यक है तथा ऐसा किये जाने का निम्न आधार होंगे –

1 . ऐसा करने से व्यापारों पर बोझ घटता है तथा निवेशकों का भरोसा बढ़ता है।
2 . ऐसा करते समय अर्थव्यवस्था का विकास, जनहित और राष्ट्रीय सुरक्षा सर्वोपरि होंगी।
3 . आपराधिक मनःस्थिति का आपराधिक दायित्व निर्धारित करने में आकलन आवश्यक है जिससे ये निष्कर्ष निकला जा सके कि त्रुटि या कानून का गैर अनुपालन लापरवाही या सद्भाविक गलती है या फिर धोखा (फ्रॉड) है।
4 . त्रुटि या कानून का गैर अनुपालन का आदतन हो जाना।

ये विधिक रूप से सुस्थापित तथ्य है कि परक्राम्य अधिनियम की धारा 138 के तहत चेक बाउंस का अपराध जब बनता है जब चेक को जारी करने वाला/वाली चेक धारक की ओर से प्रेषित चेक बाउंस का नोटिस मिलने के 15 दिन के अंदर चेक राशि का भुगतान नहीं करता/करती है.

इस प्रकार ये स्पष्ट है की प्रथम दृष्ट्या आपराधिक मनःस्थिति जो नोटिस के बावजूद भुगतान नहीं करने से प्रकट होती है तभी चेक बाउंस का आपराधिक मुक़दमा दर्ज होता है। इसलिए चेक बाउंस को अपराध के श्रेणी से बाहर करने को कोई आधार ही नहीं बनता। अगर भारत सरकार की माने तो चूँकि आपराधिक मनःस्थिति विद्यमान है तो ऐसे मामले में चेक बाउंस को अपराध की सूची से बाहर करने का कोई ठोस कारण नदारद है….

अब जहाँ तक बात बिज़नेस सेंटीमेंट्स और निवेश आकर्षित करने की है तो चेक बाउंस को गैर आपराधिक बनाने से ये कैसे सुधर जाएंगे समझ से परे है। इसके विपरीत चेक बाउंस होने से पूँजी चक्र प्रभावित होता है जिसका प्रतिकूल असर बिज़नेस सेंटीमेंट्स पर होता है। चेक बाउंस का अपराध की श्रेणी में होना कुछ हद तक वास्तविक व्यापारी व्यवसायी के बिज़नेस सेंटीमेंट्स को सम्बल देता है।

अब चेक बाउंस से घरेलू और विदेशी निवेश कैसे प्रभावित होता है ये तो सरकार ही समझाती तो अच्छा था!! सामान्य प्रक्रम में निवेशक अपने निवेश पर वांछित बढ़त के साथ वापसी का इच्छुक होता है ऐसे में कई बार चेक बाउंस का अपराध होना उसको सुरक्षा प्रदान करता है जब निवेशक को उसके निवेश या निवेश पर रिटर्न्स की सुरक्षा या सिक्योरिटी के तौर पर निवेश प्राप्त करने वाले द्वारा चेक दिया जाता है। इस प्रकार चेक बाउंस को अपराध वर्ग से हटाने का उल्टा असर होगा। जहाँ तक अपराध को शमनीय वर्ग में डालने की बात है तो चेक बाउंस का अपराध पहले से ही शमनीय है।

चेक बाउंस के अपराध रहने से वित्तीय विकास, जनहित और राष्ट्रीय सुरक्षा पर कोई प्रतिकूल प्रभाव नहीं पड़ता है. हाँ अगर इसे अपराध की श्रेणी से बाहर किया जाता है तो व्यापार और वित्तीय गतिविधियों पर प्रतिकूल प्रभाव की संभावना से इंकार नहीं किया जा सकता क्योंकि ऐसी स्थिति में वित्तीय लेन-देन की पारम्परिक व्यवस्था जिसमे चेक सिक्योरिटी के रूप में काम आते है वह चरमरा जायेगी….

लगता है त्रुटिवश चेक बाउंस को अपराध वर्ग से अलग करने के ठोस कारण हमारी सरकार बताना भूल गयी या फिर ऐसा करने का कोई कारण ही न हो….

  • युवा अधिवक्ता व पत्रकार अमित दुबे की सोशयल मीडिया पोस्ट से साभार।
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इंदौर