साहस और हिम्मत बाजारों में नहीं मिलती साहेब:त्रिनेत्र

त्रिनेत्र

साहस और हिम्मत बाजारों में नहीं मिलती साहेब यह व्यक्ति विशेष को ईश्वर प्रदत गॉड गिफ्ट के रूप में मिलती है जो रगो में बहती है और हाँ जिसका डाइलेसिस भी नहीं किया जा सकता
कल्पेश भाई आप उन्ही में से एक थे, हो और रहोगे।

आपकी जिंदगी में रोज भास्कर (सूर्योदय ) उदय होता और कब चन्द्रमा आसमान में छा जाता (रात होजाती ) यह शायद आपको भी मालूम नहीं पढ़ता, आपकी दिनचर्या ही कुछ ऐसी थी आप अपने आप में भास्करमय हो चुके थे। क्यों कि आप की आत्मा प्राण वायु बसती थी तो केवल केवल और केवल अखबार में। आपके जीवन के लिए अखबार ही ऑक्सीजन का काम करती थी कल्पेश भाई, इसलिए कब सुबह और कब शाम हो जाती आपको पता ही नहीं चलता था आपकी व्यक्ति एवं संस्थान के प्रति निष्ठा का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि
आपने आपकी पूरी जवानी एक संस्थान को दे दी।

वैसे मुझे व्यक्तिगत रूप से आप के साथ आपके सानिध्य में काम करने का सौभाग्य भले ही प्राप्त नहीं हुआ हो लेकिन आपको देख कर पढ़कर पत्रकारिता की क ख ग मुझ जैसे नौसिखिए ने भी आप से बहुत कुछ सीखने का प्रयास किया मैंने कभी नहीं देखा की आपने किसी नेता अभिनेता सितारों के साथ आपके फोटो कभी सोशियल मीडिया पर शेयर की हो मैंने कभी नहीं देखा और ना ही सुना की आपने आपके पद प्रतिष्ठा का दुरूपयोग किया हो किसी पेज 3 महफ़िल मेंआपको आकर्षण का केंद्र बनते हुए कभी नही देखा पद प्रतिष्ठा से तो आप निसंदेह बड़े थे ही और हमेशा रहोगे लेकिन आपने कभी बड़े होने का अहसास भी नहीं होने दिया आपके पास ना ही किसी की सिफारिश चलती थी ना ही चापलूसी आपके पास चलती थी तो केवल और केवल कलम कलम वह भी जो कंही गिरवी नहीं रखी होती थी
कलम वह जिसमें अपनी धार होती हो कलम वह जो सिस्टम पर प्रहार करती हो।

प्रहार वही कर सकता है जो योद्धा होता है  योद्धा वही होता है जो साहसी होता है और साहस और हिम्मत तो बाजारों में नहीं मिलती साहेब वह तो आपके चरित्र का मूल चित्रण होता है। यह भास्कर यूँ ही भास्कर नहीं बन गया साहेब। आपने अपनी पूरी जवानी खपा दी भास्कर को भास्कर बनाने में यह बात तो मालिकों से लेकर मीडिया जगत में कर कोई जानता ही है।

वैसे सुधीरजी भी मालिक कम पत्रकार ज्यादा है इसलिए पत्रकारिता में उनका फ्री हैंड एडिटोरियल की मेहनत में चार चाँद लगा देता है

लम्बे अंतराल के बाद हाल ही में आप से कैलाशजी के यंहा उठावने में भेट हुई थी, तब आपने मुझे त्रिनेत्र के नाम से पुकारा और पुछा कैसे हो त्रिनेत्र बात ही बात में आपने मुझ से पुछा था और बताओ कैसा चल रहा है क्या तुम असंभव के विरुद्ध पड़ते हो तब मैंने मजाक में कह दिया था बिलकुल नहीं इतना लम्बा चौड़ा लेख पड़ना संभव ही नहीं है आप खूब हँसे और बोले राजा तुम बहुत स्पष्ट वादी हो तुम्हारी यह आदत ही मुझे बहुत अच्छी लगती है.

मैंने विनम्रता से कहा प्रणाम भाई साहेब ,मुझे क्या मालूम था की यह मेरे आखिरी प्रणाम होगा

कल्पेश जी
आपका जाना एक परिवार का नहीं एक संस्थान का नहीं
पूरी पत्रकारिता बिरादरी का लॉस है आपके पंचतत्व में विलीन होने के बाद में इस बहस में पड़ना भी नही चाहता की आप क्यों और कैसे चले गए ? हाँ इतना ज़रूर कहूँगा की पत्रकारिता के यज्ञ में आख़िरी साँस की आहुति भी आपने आपकी कर्म भूमि में ही ली आपको सलाम त्रिनेत्र नियम शर्तें लागू।

-राजा शर्मा – -वरिष्ठ पत्रकार राजा शर्मा से साभार*

Spread the love

7

इंदौर