शब्दों की हैवानियत पर उतर आओगे तो आक्रोश से कैसे बच पाओगे…

सोनिया तो क्या जिसने हर सिरमौर को निशाना बनाया… अपने भद्दे सवालों से बवाल मचाया… जज बनकर कइयों पर दाग लगाया… न शब्दों की मर्यादा… न कहने का लहजा… न बोलने का संस्कार… न मन में शुद्धता के विचार… पत्रकारिता को कलंकित करते अर्णब गोस्वामी चीखते-चिल्लाते, तोहमतें लगाते…

खुद को महान बताते सामने बैठे व्यक्ति का जब मान उतारते नजर आते हैं तो पत्रकारिता लज्जित हो जाती है… समाज के प्रहरियों के लिए मन में घृणा भर जाती है.. बात समर्पित पत्रकारों के अस्तित्व तक आ जाती है… तब जेहन में ख्याल आता है कि ऐसे मुखौटों को सजा मिलना चाहिए… लगाई गई तोहमतों का प्रमाण लेना चाहिए…

शब्दों से चरित्र की मर्यादा को नोंचने वालों का नकाब उतरना चाहिए… हैसियत को हथियार बनाने वाला चाहे जो हों उन्हें समर्पितों के कुनबे से अलग करना चाहिए… अखबार हो या अभिव्यक्ति का कोई भी माध्यम, वो जिम्मेदार होना चाहिए… वह साहित्य और शैली की परिधि में रहना चाहिए… बात कहने का सलीका रहना चाहिए…

तोहमतें दिल में उतरना चाहिए… जिस पर सवाल उठाए जाएं उसी ने चिंतन करना चाहिए… कोई एक व्यक्ति, एक समुदाय, एक पार्टी, एक दल निशाना नहीं बनना चाहिए… सवाल व्यक्ति पर नहीं, व्यवस्था पर उठना चाहिए… आरोप शब्दों के दायरे में लगना चाहिए… जो इस मर्यादा को लांघता है वह विश्वास का हत्यारा कहलाता है… अर्णब या अर्णब जैसे लोग वैचारिकता की लाशें बिछा रहे हैं…

लोगों के मन में घृणा बढ़ा रहे हैं और उनकी मनोवृत्ति का शिकार वो पत्रकार भी बनते जा रहे हैं, जो जान की बाजी लगाकर लोगों तक सूचनाएं पहुंचा रहे हैं… बातचीत कर माहौल में सुधार ला रहे हैं… दोषी से ही उसका दोष उगलवा रहे हैं… सरकार को समझा रहे हैं… प्रशासन तक मदद पहुंचा रहे हैं… वास्तविकता का आकलन कर जनता तक पहुंचाने वाला सच ही मर्यादा की भाषा में जमाने को बता रहे हैं…

लेकिन चंद लोगों की वैचारिक हैवानियत मानवता का संहार करने पर तुली हुई है… हो सकता है कुछ लोग अर्णब की शैली के समर्थक हों… उन पर हुए हमलों को पत्रकारिता पर हमला बताएं… लेकिन वो भी समझ जाएं कि जो दूसरों पर अनर्गल हमला करेगा उस पर कोई भी हमला कर सकता है… यदि उनके पास अभिव्यक्ति का माध्यम है तो लोगों के पास भी आक्रोश का माध्यम है…

तकलीफ इस बात की है कि एक व्यक्ति की नादानी से पेशा कलंकित होता है… एक डॉक्टर लापरवाही करता है तो हजारों समर्पितों पर सवाल खड़े करता है… एक पत्रकार जब विकार लाता है तो समूचे पत्रकारों के अस्तित्व पर प्रश्न चिह्न लगाता है… अर्णब को समझना भी चाहिए और समझाना भी चाहिए… प्रश्न भी करना चाहिए… लगाम भी लगाना चाहिए… जब प्रशासन सोशल मीडिया पर प्रतिबंध लगा सकता है… वॉट्सअप ग्रुपों को प्रामाणिकता का जिम्मेदार बना सकता है… ट्विटर के आधार पर मुकदमे लगा सकता है तो अर्णब जैसे लोगों पर लगाम क्यों नहीं लगा सकता है…

  • सांध्य दैनिक अग्निबाण के प्रधान संपादक राजेश चेलावत के कॉलम ‘खरी खरी’ से साभार ।
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इंदौर