Jun 25 2019 /
3:51 AM

छापों की ‘राजनीति’ में कहीं क्रिया की प्रतिक्रिया ना हो जाए…

विगत 3 दिनों से मध्यप्रदेश में सियासत इंदौर, भोपाल में आयकर छापों को लेकर जबरदस्त गरमाई हुई है। मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री कमल नाथ के नजदीकी लोगों को इन छापों की आड़ में घेरने की प्रयास किए गए। इसे लेकर आरोप प्रत्यारोप का दौर भी जारी है।

यह तो तय है कि लोकसभा चुनाव सिर पर है और इन छापों को लेकर भी राजनीतिक लाभ हानि तय किए जाएंगे, लेकिन इसी के साथ इस संभावना को भी नहीं नकारा जा सकता कि ऐसा ही चलता रहा तो क्रिया की प्रतिक्रिया भी हो सकती हैं। यह मान भी लिया जाए कि तमाम गड़बड़ी की शिकायतों के आधार पर यह कार्रवाई की गई हो, लेकिन यह सवाल तो उठना स्वाभाविक है इसके लिए लोकसभा चुनाव की पूर्व का ही समय क्यों चुना गया? जिस ढंग से छापों के तुरंत बाद राजनीतिक आरोप प्रत्यारोप का दौर चला उससे भी यही संकेत मिलते हैं कि इसके पीछे राजनीतिक लाभ लेने की मंशा है।

ऐसा पहली बार ही नही हुआ। पहले कर्नाटक से लेकर यूपी बिहार आदि जगहों पर भी ऐसे ही राजनीतिक रंजिशें निकालने के आरोप विपक्षी नेताओं द्वारा केंद्र की सत्तारूढ़ पार्टी पर लगाए जाते रहे है। ऐसे में यदि जांच एजेंसियों का उपयोग राजनीतिक रंजिशें निकालने के लिए होता रहा तो पलटवार भी सम्भावित है जैसा पश्चिम बंगाल में देखने को मिला।

जिस तरह कई जांच एजेंसियां केंद्र सरकार के अधीन है तो कुछ जांच एजेंसी राज्य सरकार के मातहत भी काम करती है। मप्र की बात करें तो यहां भी कई घोटालों की गूंज समय समय पर होती रही है जिसमे प्रदेश के अनेक दिग्गज माने जाने वाले नेता आरोपों के घेरे में रहे। ऐसे में जब यहां के मुख्यमंत्री को ही घेरने का प्रयास किया गया हो तो कोई बड़ी बात नहीं है कि क्रिया की प्रतिक्रिया पलटवार के रूप में देखने को मिले। लेकिन कुल मिलाकर यह स्वस्थ प्रजातंत्र के लिये अच्छे संकेत नही है।

बकलम- तेजकुमार सेन

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इंदौर