Mar 20 2019 /
10:51 AM

कमल के पैतरों से ‘कमल‘ हैरान

नई विधानसभा के पहले सत्र में विधानसभा में जो हुआ, उसने भाजपा को हैरत में डालने का काम कर दिया है। कहां तो कमलनाथ सरकार को गिराने के मंसूबे नेताओं ने पाल रखे थे और कहां विधानसभा अध्यक्ष के साथ उपाध्यक्ष का पद भी गंवा बैठे। यह सब पार्टी के उन नेताओं के कारण हुआ जो एक-दूसरे को नीचा दिखाने में जुटे हुए थे।

पंद्रह साल शासन में रहने वाले भाजपा नेताओं को उन लोगों ने नियम-कानून के जरिये गच्चा दे दिया, जिन्हें अब से पहले तक कुछ नहीं समझा जा रहा था।

सदन के उद्घाटन सत्र में मुख्यमंत्री कमलनाथ की इस पैंतरेबाजी को भाजपा समझ पाती तब तक सारे सूत्र उसके हाथ से निकल चुके थे और अब हाथ मलने के अलावा उसके पास कुछ बचा नहीं।

प्रोटेम स्पीकर का विरोध करने वाली भाजपा विधानसभा अध्यक्ष के निर्वाचन में चुनाव लड़े बिना परास्त हो गई। यही हाल विधानसभा उपाध्यक्ष पद का भी हुआ, जिसमे कांग्रेस की हिना कांवरे निर्वाचित हो गईं।

बहरहाल, सदन में पिछले दो दिनों में जिस तरह से भाजपा कांग्रेस के सामने कमजोर पड़ी, उसका असर संगठन पर भी हुआ है। लोकसभा चुनाव में कार्यकर्ताओं में फैली निराशा को कैसे दूर किया जाए, यह चुनौती संगठन के सामने खड़ी हुई है।

भगवानदास इसरानी की बड़ी भूमिका –

विधानसभा के पूर्व प्रमुख सचिव भगवानदास इसरानी रिटायरमेंट के बाद कांग्रेस में शामिल हो चुके हैं। विधानसभा में लंबा अनुभव रखने वाले इसरानी ने पहले सत्र की कार्रवाई में महती भूमिका निभाई।

सत्र शुरू होने से पहले मुख्यमंत्री के साथ लंबी बैठकें हुईं, जिनमें नियम-कानून को खंगालने का काम किया गया। प्रोटेम स्पीकर की नियुक्ति से लेकर प्रस्ताव रखने तक की सारी योजना इसरानी ने तैयार की थी। आपसी झंझावतों में उलझी भाजपा कांग्रेस की इसी रणनीति में उलझकर रह गई।

इसलिए सक्सेना को बनाया था प्रोटेम स्पीकर –

विधानसभा सत्र शुरू होने से ठीक पहले कमलनाथ ने प्रोटेम स्पीकर के रूप में अपने विश्वस्त दीपक सक्सेना का नाम आगे कर दिया। विधानसभा अध्यक्ष के नाम के पहले चार प्रस्ताव कांग्रेस की ओर से पेश किए गए।

संसदीय कार्य मंत्री डॉ. गोविंदसिंह, विधायक कुंवर विक्रम सिंह, संजीव सिंह और विधि और विधायी कार्य मंत्री पीसी शर्मा ने एनपी प्रजापति के नाम का प्रस्ताव रखा। पांचवां प्रस्ताव भाजपा की ओर से विजय शाह के नाम का था। प्रोटेम स्पीकर ने पहले चार प्रस्ताव चर्चा के लिए रख दिए।

इस बात का भाजपा ने घोर विरोध जताया, पर नियम 4 का हवाला देते हुए इस विरोध को दरकिनार कर दिया गया। बात नियम-कानून की थी और भाजपा के पास दूसरा कोई चारा भी नहीं था, लिहाजा भाजपा ने सदन से बहिर्गमन कर दिया।

बस इसी मौके का कांग्रेस को इंतजार था और उसने न सिर्फ वोटिंग कराकर एनपी प्रजापति को अध्यक्ष निर्वाचित करवा दिया, बल्कि इसी के जरिये फ्लोर टेस्ट भी हो गया, जिसमे 120 विधायकों की हिस्सेदारी रही।

चूकने के बाद भी नहीं संभले –

विधानसभा अध्यक्ष पद से चूकी भाजपा उपाध्यक्ष पद के निर्वाचन में भी संभल नहीं पाई। कल अध्यक्ष एनपी प्रजापति ने पहले चार प्रस्ताव चर्चा में रखे, जो हिना कांवरे के नाम से थे, जबकि पांचवां प्रस्ताव भाजपा के जगदीश देवड़ा के नाम का था।

भाजपा पांचों प्रस्ताव एक साथ पढ़े जाने की जिद पर अड़ी रही। शिवराज, गोपाल भार्गव, सीताशरण शर्मा पाइंट आॅफ आॅर्डर पर अपनी बात कहने पर जोर देते रहे।

बहरहाल, जोरदार हंगामे के बाद भी भाजपा न तो प्रस्ताव पर चर्चा करा सकी और न ही मत विभाजन करवा पाई। अध्यक्ष की तर्ज पर ही कांग्रेस ने उपाध्यक्ष पद भी हथिया लिया।


वरिष्ठ पत्रकार प्रदीप जोशी
की फेसबुक वॉल से साभार

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