May 26 2019 /
8:36 PM

खूब मार खाई लेकिन क्रिकेट नहीं छोड़ा

  • मप्र रणजी टीम के भरोसेमंद तेज गेंदबाज कुलदीप सेन की कहानी
गौरीशंकर दुबे

इंदौर। रीवा से कोई पंद्रह किलोमीटर की दूरी पर गांव हरिहरपुर है। इसकी आबादी करीब बारह सौ है। गांव के बच्चों ने कभी सीजन बॉल नहीं देखी थी। इंग्लिश विलो बैट और पेड तो दूर की बात। यह बात अलग है कि गांव के बच्चों को अब सीजन बॉल से खेलने को मिल जाता है।

जिन किसानों के पास 25 पचास बीघा जमीन है, वे अपने बच्चों में कुलदीप देखने लगे हैं। कुलदीप सेन इसी गांव है और डोमेस्टिक क्रिकेट का उभरता नाम है। मप्र के लिए बीते रणजी क्रिकेट सत्र में 8 मैच खेले और 25 विकेट लिए।

इससे पहले के साल में जब मप्र की टीम कर्नल सीके नायडू ट्रॉफी अंडर -23 क्रिकेट स्पर्धा के प्लेट समूह से एलिट के लिए क्वालिफाई हुई, तो कुलदीप 30 विकेट लिए। सुनील गावस्कर के जमाने में क्रिकेट खेलने वाले बच्चों को यह कहकर खेल से रोका जाता था कि बड़ा आया गावस्कर की औलाद।

कुलदीप उस जमाने में पैदा हुए, जबकि सचिन तेंदुलकर खेल में पैसों की बरसात करवाने लगे थे। शाम को जब वे रबर और टेनिस की गेंद से खेलकर घर लौटते, तो पिता के सामने गाल आगे कर देते थे, क्योंकि डांट खाने के साथ उन्हें मार खाना ही पड़ती थी। वे तब तक मार खाते रहे,

जबकि रीवा डिवीजन टीम में आ गए। बाद में मप्र अंडर -23 टीम और उसके बाद रणजी टीम में भरोसेमंद गेंदबाज बन गए हैं। कुलदीप को एक लड़ाई लड़ना पड़ी। उनके पिता रामपाल गांव में एक छोटी सी गुमटी में हजामत करते हैं।

उनपर दवाब था कि पुश्तैनी कला सीख लें। यह बात न मानने के लिए उन्हें तब और मार पड़ती थी, जबकि पिता को खाना देने जाते थे। और मार और डांट तब और जब वे पढ़ाई नहीं करते थे, क्योंकि कॉपी किताबों में भी उन्हें भुवनेश्वर कुमार से लेकर डेल स्टेन नज़र आते थे।

अब रामपाल सेन बदल गए। वे चाहत हैं कि कुलदीप टीम इंडिया की कैप पहनें। स्टार टीवी ने बीते दिनों जब मप्र और पंजाब का मैच टीवी पर दिखाया, तो पूरा गांव पंचायत भवन के ओंटले पर जमा था। कुलदीप ने पारी में पांच विकेट लिए।

जाहिर सी बात थी गांव पहुंचने पर उनका जोरदार स्वागत किया गया। पिता ने पूरे गांव को दावत दी। अब तो रणजी मैच खेलने के भी एक लाख तीस हजार रुपए दिए जाते हैं, तो कुलदीप ने पिता को रातों रात लखपति बना दिया।

कुलदीप पूरी कमाई मां गीता देवी को देते हैं। चाहते हैं कि पिता काम बंद दें, लेकिन वे नहीं मानते। कहीं कसर रह गई, नहीं तो वे आईपीएल में किंग्स इलेवन पंजाब के लिए खेल रहे होते। कुलदीप को एक माइनर काउंटी ने इंग्लिश क्रिकेट में खेलने बुलाया था,

लेकिन वे आॅफ सीजन में फिटनेस और ट्रेनिंग ईश्वर भैय्या (ईश्वर पांडे) के साथ करेंगे। चेन्नई सुपर लीग की एक टीम की निगाह भी उनपर है।

कुलदीप कहते हैं -मेरे पास कुछ नहीं था। शायद ईश्वर भाई ने मेरी आंखों पढ़ लिया था कि मुझे क्या चाहिए। उन्होंने मुझे स्पाइक्स वाले जूते दिए थे। लोअर टी शर्ट भी।

गेंदबाज के पास कुछ न हो, लेकिन जूते तो होना ही चाहिए। ईश्वर भैय्या की कृपा है कि आज मैं उड़ाने भर पा रहा हूं। कुलदीप के लिए यह सपने के सच होने जैसा है कि वे उन्हीं ईश्वर पांडे के साथ दूसरे एंड से नई गेंद डालते हैं, जिनसे क्रिकेट की बारीकियां सीखीं। हरिहरपुर का पोस्टर बाय इन दिनों गांव के बच्चों के सपने को भी उड़ान दे रहा है।

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